कहा— सजा देने का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका को, पुलिस को नहीं
प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस मुठभेड़ों में अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी आरोपी को दंडित करने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है, पुलिस को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने ऐसी घटनाओं को कानून के शासन और संवैधानिक मूल्यों के प्रतिकूल बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने आदेश की अवहेलना पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।
जमानत अर्जी की सुनवाई में अहम टिप्पणी
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने मामले में आरोपी को सशर्त जमानत प्रदान की।
सुनवाई के दौरान याची की ओर से अधिवक्ता कुसुम मिश्रा ने दलील दी कि आरोपी को झूठे मामले में फंसाया गया है और कथित पुलिस मुठभेड़ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया।
वरिष्ठ अधिकारियों से मांगा जवाब
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद और पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्णा को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तलब कर जवाब मांगा।
दोनों अधिकारियों ने अदालत को अवगत कराया कि पुलिस मुठभेड़ों से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन हेतु सर्कुलर जारी किए जा चुके हैं, और किसी भी स्तर पर उल्लंघन पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
छोटे अपराधों में भी मुठभेड़ पर सवाल
पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल के दिनों में चोरी और लूट जैसे छोटे अपराधों में भी मुठभेड़ दिखाकर आरोपियों के पैरों में गोली मारने की घटनाएं सामने आ रही हैं।
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि मौजूदा मामले में किसी भी पुलिसकर्मी को चोट नहीं आई, जिससे पूरी घटना संदेह के घेरे में आती है।
हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
पुलिस कानून की रक्षक है, निर्णायक नहीं
मुठभेड़ को सजा का विकल्प नहीं बनाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन अनिवार्य

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