उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर
देश के 26 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश—जो देश की राजनीति की धुरी माना जाता है—अब तक इस सूची से बाहर है। यह देरी सामान्य नहीं है, बल्कि 2026 में प्रस्तावित पंचायत चुनाव और 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी आलाकमान बेहद सतर्कता से फैसला लेना चाहता है।
दिल्ली में इस समय यूपी भाजपा अध्यक्ष को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष का चयन निर्विरोध ही होगा। भाजपा की आंतरिक चुनाव प्रक्रिया इतनी मजबूत और रणनीतिक है कि किसी प्रकार की बगावत या चुनौती की संभावना लगभग नगण्य है। बगैर शीर्ष नेतृत्व की अनुमति के नामांकन तक पहुंचना भी असंभव है, क्योंकि इसके लिए प्रदेश परिषद के कम से कम 10 फीसदी सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है।
कौन हैं दावेदार? बढ़ती धड़कनों के बीच टिकी निगाहें
UP BJP के नए अध्यक्ष के लिए संभावित चेहरों की दौड़ तेज हो गई है। इस समय तीन प्रमुख वर्गों—पिछड़ा, दलित और ब्राह्मण—के नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं:
- पिछड़ा वर्ग से:
- धर्मपाल सिंह (पशुपालन मंत्री) – केंद्रीय नेताओं से हुई मुलाकातों के बाद इनका नाम चर्चा में सबसे ऊपर है।
- स्वतंत्र देव सिंह (जलशक्ति मंत्री) – पहले भी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, आरएसएस और सीएम योगी के करीबी माने जाते हैं।
- बीएल वर्मा (केंद्रीय राज्यमंत्री) – संगठन में गहरी पकड़, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से घनिष्ठ संबंध।
- दलित वर्ग से:
- रामशंकर कठेरिया (पूर्व केंद्रीय मंत्री)
- विनोद सोनकर (पूर्व सांसद)
- विद्यासागर सोनकर (एमएलसी) – सभी सक्रिय प्रयास में जुटे हैं।
- ब्राह्मण वर्ग से:
- हरीश द्विवेदी (पूर्व सांसद, बस्ती)
- डॉ. दिनेश शर्मा (राज्यसभा सांसद)
- श्रीकांत शर्मा (विधायक, मथुरा)
सीधे घोषणा या चुनाव? दोनों विकल्प खुले
भाजपा सूत्रों के अनुसार, पार्टी यूपी में चुनाव कार्यक्रम कभी भी जारी कर सकती है। एक बार कार्यक्रम घोषित होते ही 2-4 दिनों के भीतर निर्विरोध चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव पहले हो गया, तो यूपी भाजपा अध्यक्ष की सीधी घोषणा नए राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा की जा सकती है।
12 साल बाद फिर होगा चुनाव, या सीधा नियुक्ति?
2013-14 में लक्ष्मीकांत बाजपेयी को अंतिम बार चुनाव के जरिए प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। इसके बाद केशव प्रसाद मौर्य, महेंद्रनाथ पांडेय, स्वतंत्र देव सिंह और भूपेंद्र सिंह चौधरी को सीधी नियुक्ति के जरिए अध्यक्ष पद मिला। यानी 12 वर्षों बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष औपचारिक चुनाव प्रक्रिया से चुनने की संभावना बन रही है, वो भी निर्विरोध।
निष्कर्ष:
उत्तर प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर चल रही हलचल जल्द ही विराम पा सकती है। अब देखना यह है कि पार्टी संगठन चुनाव की राह पर जाता है या नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के हाथों यूपी प्रदेश अध्यक्ष की सीधी ताजपोशी होती है।

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