2027 के लिए सपा का ‘PDA’ फॉर्मूला बदलेगा सियासत? संगठन में अब भी हावी M-Y समीकरण

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल चर्चा में है—क्या 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए का ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला वास्तव में संगठन में लागू हो पाया है या पार्टी अब भी पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर ही निर्भर है।

के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी ने 2022 विधानसभा चुनाव के बाद PDA का नारा दिया था। में इसी रणनीति के सहारे पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 37 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि गठबंधन सहयोगी को भी 6 सीटों पर सफलता मिली। उस समय यह माना गया था कि पार्टी संगठन में भी सामाजिक संतुलन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएगी।

लेकिन मौजूदा संगठनात्मक ढांचे पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। प्रदेश के 97 जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्षों में से करीब 70 प्रतिशत पदों पर मुस्लिम और यादव समुदाय का दबदबा बताया जाता है। इनमें लगभग 44 प्रतिशत यादव और करीब 24 पदों पर मुस्लिम नेतृत्व है।

दिलचस्प बात यह है कि प्रदेश में दलित आबादी करीब 20 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है, लेकिन संगठन में सिर्फ तीन जिलाध्यक्ष दलित समुदाय से हैं। वहीं सामान्य वर्ग के नेताओं को भी सीमित प्रतिनिधित्व मिला है और कई प्रभावशाली जातियों को संगठन में जगह नहीं मिल पाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक लंबे समय से मुस्लिम-यादव समीकरण रहा है, इसलिए संगठन में इसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। हालांकि PDA के नारे के बाद यह उम्मीद भी बनी थी कि गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और अन्य वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।

प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में भी अलग राजनीतिक समीकरण देखने को मिलते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी ने मुस्लिम नेतृत्व पर अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसा जताया है, जबकि पूर्वांचल में यादव समुदाय का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। कुछ मंडलों में तो संगठन पूरी तरह M-Y समीकरण पर आधारित नजर आता है।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार को देखते हुए आने वाले समय में संगठनात्मक बदलाव संभव हैं। पार्टी के सामने व्यापक सामाजिक संतुलन बनाने की चुनौती भी रहेगी, क्योंकि अन्य दल भी अलग-अलग जातीय समूहों को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 के लिए समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला वास्तव में जमीन पर उतर पाएगा या पार्टी फिर से अपने पारंपरिक समीकरण पर ही दांव लगाएगी।

(रॉयल शाइन टाइम्स)

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