वाराणसी। वाराणसी स्थित अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान–दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) में 7 और 8 मार्च को धान नीतियों पर दो दिवसीय उच्च स्तरीय नीति संवाद का आयोजन किया जाएगा। यह कार्यक्रम भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।
इस संवाद का मुख्य विषय “भारत में टिकाऊ एवं सुदृढ़ धान प्रणाली के लिए नीतियों का पुनर्गठन: सीख और प्राथमिकताएँ” रखा गया है। कार्यक्रम के दौरान धान उत्पादन से जुड़ी वर्तमान नीतियों की समीक्षा की जाएगी और भविष्य में आवश्यक सुधारों पर व्यापक चर्चा होगी।
कार्यक्रम में विभिन्न सरकारी संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी, नीति निर्माता, शोधकर्ता, विकास सहयोगी संस्थाएँ, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि और किसान भाग लेंगे। उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें शामिल होंगे, जिनमें मुख्यमंत्री के सलाहकार, कृषि उत्पादन आयुक्त तथा प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी भागीदारी करेंगे। इसके अलावा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगे।
भारत की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और कृषि अर्थव्यवस्था में धान की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक और प्रमुख उत्पादक देश भी है। हालांकि, भूजल स्तर में गिरावट, बढ़ती उत्पादन लागत और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ धान प्रणाली की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं।
आइसार्क के निदेशक सुधांशु सिंह के अनुसार यह नीति संवाद वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित नीतिगत सुधारों और जलवायु-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच साबित होगा। चर्चा के प्रमुख विषयों में धान बाजार और व्यापार, पर्यावरणीय स्थिरता तथा जलवायु-अनुकूल तकनीकों जैसे धान की सीधी बुआई (DSR) के विस्तार पर विचार किया जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक पानी की खपत कम करने, मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को घटाने और उत्पादन लागत कम करने में सहायक मानी जाती है।
कार्यक्रम के दौरान मुख्य व्याख्यान, विशेषज्ञ पैनल चर्चा और विभिन्न हितधारकों के परामर्श सत्र आयोजित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य प्रमाण आधारित नीति निर्माण को मजबूत करना और देशभर में टिकाऊ धान आधारित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना है।

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