पिंडरा (वाराणसी)।
पिंडरा विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के भीतर इस समय वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आती दिख रही है। क्षेत्र में सक्रिय दो बड़े नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान चरम पर पहुंच गई है, जिससे संगठन और बूथ स्तर तक स्पष्ट असर दिखाई देने लगा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता अब “दो खेमों” में बंटे नजर आ रहे हैं, जिसके चलते कार्यकर्ताओं के बीच भारी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
पिंडरा क्षेत्र के भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से ही माहौल गर्म होने लगा है, लेकिन पार्टी के अंदर बढ़ती गुटबाज़ी ने सभी को परेशान कर रखा है। कई बूथ अध्यक्षों और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि बड़े नेताओं के आपसी टकराव के कारण जमीनी स्तर पर संगठन की एकता कमजोर पड़ रही है।
स्थानीय राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पिंडरा विधानसभा में भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेता एकजुट होकर काम करने के बजाय अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र को बचाने और बढ़ाने में लगे हुए हैं। कई कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि “जब बड़े नेता ही आपस में भिड़े हैं, तो कार्यकर्ता किसके साथ जाएं?” यही असमंजस पूरे क्षेत्र में फैल गया है।
इस अंदरूनी खींचतान का असर यह है कि कई पुराने कार्यकर्ता पार्टी लाइन के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा के आधार पर खेमे चुनने को मजबूर हो रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में यह डर भी बढ़ रहा है कि यदि यह स्थिति बनी रही, तो विधानसभा में पार्टी की चुनावी रणनीति पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
इसी बीच, क्षेत्र के कई युवा कार्यकर्ताओं ने यह भी बताया कि कुछ लोग संभावित राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए अन्य पार्टियों से संपर्क साधने लगे हैं। कई कार्यकर्ता खुले तौर पर कह रहे हैं कि “अगर समय रहते एक नेतृत्व तय नहीं हुआ, तो पिंडरा विधानसभा में भाजपा की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा जैसे बड़े संगठन में स्थानीय स्तर पर खींचतान आम बात है, लेकिन यदि यह खुलेआम वर्चस्व की लड़ाई का रूप ले ले, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है और विपक्ष को मौके मिलते हैं। पिंडरा में जारी खेमेबाज़ी भी इसी दिशा में इशारा कर रही है।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से इस मुद्दे पर अब तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, लेकिन कार्यकर्ताओं की बढ़ती असंतोष और असमंजस को देखते हुए संगठन को जल्द हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।

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