बनारस बीजेपी में नेतृत्व का इंतज़ार लंबा, जिलाध्यक्ष की कुर्सी पर सस्पेंस बरकरार

भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेशभर में नए जिलाध्यक्षों की सूची जारी कर दी है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कर्मभूमि बनारस का जिलाध्यक्ष अब तक घोषित नहीं हुआ। यह देरी सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि संगठन के भीतर चल रही गहरी उलझनों और समीकरणों का संकेत भी मानी जा रही है।

महानगर अध्यक्ष घोषित, जिला इकाई अब भी ‘खाली’

बीजेपी ने महीनों पहले महानगर अध्यक्ष की घोषणा कर दी थी, जिसमें फिर से प्रदीप अग्रहरि को ही कमान सौंपी गई। नए चेहरे की उम्मीद करने वालों को यह फैसला चौंकाने वाला लगा। वहीं जिला इकाई का नेतृत्व कौन करेगा—इस पर अभी तक सन्नाटा पसरा हुआ है।
राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी को बनारस में नया जिलाध्यक्ष मिल ही नहीं रहा?

हंसराज विश्वकर्मा पर दोहरी जिम्मेदारी—क्या नियम एक, फैसले दूसरे?

सबसे बड़ी चर्चा का विषय बने हैं मौजूदा जिलाध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा। उन्हें एमएलसी बनाए जाने के बाद भी संगठन ने जिलाध्यक्ष पद पर कायम रखा है।
बीजेपी का आधिकारिक सिद्धांत एक व्यक्ति–एक पद का है, लेकिन बनारस में यह सिद्धांत मानो लागू ही नहीं हो रहा।

पार्टी में यह सवाल गूंज रहा है—
क्या बनारस में हंसराज विश्वकर्मा का कोई विकल्प नहीं बचा?
क्या संगठन एक ही चेहरे पर अत्यधिक निर्भर हो गया है?

ओबीसी कोटे से लगातार नेतृत्व, सामान्य वर्ग की दावेदारी अधर में

कई कार्यकर्ताओं का मत है कि हंसराज विश्वकर्मा पहले ही लंबे समय से ओबीसी कोटे का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में इस बार सामान्य वर्ग से किसी सक्षम नेता को अवसर देना चाहिए था।
अगर ऐसा नहीं होता, तो अंदरूनी नाराज़गी और असंतुलन बढ़ना तय माना जा रहा है।

‘बनारस का दूसरा मोदी’?

दूसरी ओर, कुछ कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कि अगर संगठन हंसराज का विकल्प खोजने में असमर्थ है, तो इसका अर्थ है कि उनका कद बीजेपी में काफी ऊँचा हो चुका है।
बनारस इकाई में वे इतने प्रभावी हो चुके हैं कि कार्यकर्ता उन्हें मज़ाक में—
“बनारस का दूसरा मोदी” कहने लगे हैं।

कार्यकर्ताओं के लिए चुनौती—काबिलियत दिखाएं, तभी मौका मिलेगा

जिले में नेतृत्व बदलने की मांग करने वाले कई कार्यकर्ताओं को भी आत्ममंथन की जरूरत है।
आज की सच्चाई यही है कि—
सिर्फ टी-शर्ट पहनकर रैली में भीड़ जुटाना, बैनर लगाना या नारे लगाना अब नेतृत्व की गारंटी नहीं है।
जब तक कार्यकर्ता हंसराज जैसे प्रभाव, संगठनात्मक पकड़ और नेतृत्व क्षमता विकसित नहीं करेंगे, जिलाध्यक्ष का पद उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता रहेगा।

निष्कर्ष

बनारस बीजेपी में जिलाध्यक्ष के नाम पर हो रहा यह लंबा इंतज़ार संगठन की दिशा और दशा, दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब बनारस की राजनीति की निगाहें इस पर टिकी हैं कि बीजेपी कब और किसे नए जिलाध्यक्ष के रूप में सामने लाती है—और क्या यह फैसला संगठन को संतुलन भी देगा या और विवाद खड़ा करेगा।

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