बरसात भी न रोक सकी आस्था की बाढ़ : नाटी इमली का भरत मिलाप सम्पन्न, 482 वर्षों से जीवित परंपरा

वाराणसी की धरती ने एक बार फिर अपनी अमर परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम दिखाया। शुक्रवार को तेज वर्षा और गरजते बादलों के बीच भी नाटी इमली का ऐतिहासिक भरत मिलाप पूरे हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं का जोश बारिश की धाराओं पर भारी पड़ा और हजारों की भीड़ हाथों में छाता लिए मैदान में उमड़ पड़ी।

विश्व प्रसिद्ध भरत मिलाप
दशहरा के ठीक अगले दिन आयोजित इस भरत मिलाप में भगवान श्रीराम, माता सीता, भाई लक्ष्मण और हनुमान पुष्पक विमान पर सवार होकर मैदान पहुंचे। इसके बाद अयोध्या से भरत और शत्रुघ्न भी आसीन हुए। जैसे ही श्रीराम और लक्ष्मण रथ से उतरकर भरत-शत्रुघ्न की ओर दौड़े और गले लगाया, पूरे मैदान में “हर-हर महादेव” और
“सियावर रामचंद्र की जय” के गगनभेदी नारे गूंज उठे। मात्र तीन मिनट की इस दिव्य लीला ने भक्तों को भावविभोर कर दिया।

परंपरा की नींव और मान्यता
किवदंती है कि मेघा भगत को भगवान श्रीराम ने स्वप्न में दर्शन देकर इस भरत मिलाप की नींव रखने का आदेश दिया था। तभी से यह लीला निरंतर होती आ रही है। इस दौरान यादव बंधुओं ने परंपरा का निर्वहन करते हुए भगवान के पुष्पक विमान को अयोध्या तक पहुंचाया।

काशी राज परिवार की भागीदारी
नाटी इमली के भरत मिलाप में काशी राज परिवार की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है। वर्ष 1796 से चली आ रही इस परंपरा को इस बार भी काशीराज परिवार के डॉ. अनंत नारायण सिंह ने निभाया। मौसम प्रतिकूल होने के कारण वे इस बार हाथी के स्थान पर वाहन से पहुंचे, लेकिन परंपरा टूटी नहीं।

बारिश भी न डिगा सकी श्रद्धा
भारी वर्षा के बावजूद श्रद्धालु डटे रहे। विदेशी मेहमानों तक ने इस अद्वितीय आयोजन को देखकर भारतीय संस्कृति और काशी की परंपरा के प्रति उत्साह दिखाया। इस प्रकार 482वें भरत मिलाप ने साबित कर दिया कि “सात वार नौ त्योहार वाली काशी” आज भी अपनी परंपराओं के प्रति उतनी ही जीवंत और जागरूक है।

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