डोमराजा से विद्वत परिषद तक विरोध, मणिकर्णिका घाट का आयोजन विवादों में
वाराणसी। काशी की आध्यात्मिक धरती पर जीवन और मृत्यु का अद्वितीय संगम सदियों से आस्था और दर्शन का केंद्र रहा है। स्थित महाश्मशान में फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को खेले जाने वाली ‘मसान की होली’ इस परंपरा का प्रतीक मानी जाती है।
लेकिन इस वर्ष यह आयोजन आस्था और शास्त्र की बहस के बीच घिर गया है। एक ओर भक्त इसे शिवमय अनुभूति बताते हैं, तो दूसरी ओर विद्वत परिषद, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा और डोमराजा परिवार इसे अशास्त्रीय ठहराते हुए रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।
परंपरा का उद्भव: 2012 से पुनः प्रारंभ
मान्यता है कि भगवान शिव अपने गणों के साथ चिता-भस्म से फाग रचाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार विवाह के समय गणों को साथ न ले जाने की टीस दूर करने के लिए शिव ने महाश्मशान में भस्म की होली खेली।
महाश्मशान नाथ मंदिर सेवा समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, इस परंपरा को वर्ष 2012 में पुनः प्रारंभ किया गया। तब से यह आयोजन हर वर्ष विस्तार पाता गया और देश-विदेश से श्रद्धालु इसमें शामिल होने लगे।
आस्था बनाम अशास्त्रीयता
काशीवासियों के एक वर्ग के लिए यह आयोजन जीवन और मृत्यु को समान भाव से स्वीकार करने का प्रतीक है। उनका मानना है कि भस्म की होली खेलना शिव की आराधना और वैराग्य का भाव जागृत करता है।
वहीं विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि श्मशान उत्सव का स्थल नहीं है। परिषद सदस्यों का तर्क है कि यह परंपरा हाल के वर्षों में शुरू हुई और शास्त्रसम्मत प्रमाण नहीं रखती।
डोमराजा परिवार का विरोध
डोमराजा परिवार ने जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर आयोजन पर रोक लगाने की मांग की है। उनका आरोप है कि आयोजन के दौरान शराब और हुड़दंग जैसी गतिविधियां धार्मिक मर्यादाओं के विपरीत हैं।
विरोधियों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया प्रचार के कारण भीड़ अनियंत्रित हो रही है और आयोजन व्यावसायिक रूप लेता जा रहा है।
मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव
2009 में प्रख्यात शास्त्रीय गायक द्वारा गाया गया भजन “खेले दिगंबर मसाने में होली” चर्चा में आया। 2015 के बाद यह आयोजन राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रहा।
2021 में के लोकार्पण के बाद सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों ने भी इसे व्यापक प्रचार दिया, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ी।
दो धड़ों में बंटा समाज
एक पक्ष इसे शिव की आराधना और जीवन-मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने का प्रतीक मानता है।
दूसरा पक्ष इसे धार्मिक अनुशासन और शास्त्रीय मर्यादाओं के विरुद्ध बताता है।
इस विवाद ने काशी की सांस्कृतिक पहचान को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।
निष्कर्ष
‘मसान की होली’ इस बार काशी में आस्था और शास्त्र के बीच खिंची रेखा का प्रतीक बन गई है।
क्या यह आयोजन परंपरा के रूप में जारी रहेगा या विरोध के चलते सीमित होगा — यह प्रशासन और समाज के सामूहिक निर्णय पर निर्भर करेगा।
(रिपोर्ट: रॉयल शाइन टाइम्स)

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