वाराणसी।
गंगा के पावन तट पर बसी वाराणसी—जिसे काशी और बनारस भी कहा जाता है—भारत का वह अद्वितीय नगर है, जहां जीवन और मृत्यु का अर्थ बदल जाता है। यह दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में माना जाता है और हिंदू धर्म में इसका स्थान इतना ऊँचा है कि यहां “मृत्यु भी मोक्ष का द्वार” कही जाती है।
कहते हैं, काशी की सुबह किसी वरदान जैसी होती है। सूर्य की पहली किरण जब गंगा के जल में उतरती है, तो लगता है मानो पूरी सृष्टि पुनर्जन्म ले रही हो। संकरी गलियों में गूंजती घंटियों की आवाज़, त्रिशूल और कण्ठी पहने साधु, और शाम की गंगा आरती का मनोहारी दृश्य—यह सब मिलकर काशी को सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि अनुभव बनाते हैं।
“वाराणसी” नाम का रहस्य
शहर का नाम उसकी भौगोलिक रचना में छिपा है। उत्तर की ओर बहती वरुणा और दक्षिण में स्थित असि नदी के बीच बसा यह क्षेत्र “वाराणसी” कहलाया।
यह नगरी भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, जहाँ काशी विश्वनाथ के दर्शन दुनिया भर के भक्तों का मन पवित्र कर देते हैं। बनारसी साड़ी, शहनाई, पेंटिंग, योग और तंत्र परंपरा—यहाँ की संस्कृति सदियों से दुनिया को प्रभावित करती रही है।
पौराणिक कथा: शिव का अविमुक्त क्षेत्र
स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णित कथा के अनुसार, काशी भगवान शिव की सबसे प्रिय नगरी है। कहा जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में शिव ने पार्वती से कहा था—
“मैं ऐसी नगरी बसाऊँगा जो कभी विनाश को प्राप्त न हो। जहाँ मृत्यु भी मुक्ति का द्वार बने।”
इसी संकल्प से शिव ने अपने त्रिशूल पर एक दिव्य भूमि—अविमुक्त क्षेत्र, अर्थात काशी—को स्थापित किया। मान्यता है कि प्रलय के समय भी यह भूमि नष्ट नहीं होती, क्योंकि भगवान शिव स्वयं इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं।
यही कारण है कि काशी को अमर नगरी कहा जाता है।
मोक्ष की नगरी
यहाँ गंगा का उत्तरवाहिनी प्रवाह इसे और भी पवित्र बनाता है।
मणिकर्णिका घाट पर निरंतर जलती चिताएँ मृत्यु को जीवन का हिस्सा बनाती हैं, जबकि दशाश्वमेध घाट की शाम की आरती जीवन को उत्सव में बदल देती है। माना जाता है कि काशी में मृत्यु प्राप्त करने वाले को शिव स्वयं मोक्ष प्रदान करते हैं।
काशी की यही अनुभूति उसे दुनिया के हर शहर से अलग करती है—एक ऐसा स्थान जहाँ जीवन का आरंभ भी है और अंत भी, और जहाँ अंत भी एक नई शुरुआत माना जाता है।

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