क्या उन्मादी भीड़ ने किया मनीष सिंह के साथ इंसाफ या जनता में घुली जातीवादी राजनीति हलचल हुई तेज
मनीष सिंह का हत्या सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि समाज के भीतर पनपते ‘विष’ का विस्फोट है.वाराणसी के घमहापुर में घटी यह घटना केवल एक हत्या नहीं है, बल्कि उस सामाजिक विकृति का भयावह चेहरा है, जो धीरे-धीरे हमारे बीच सामान्य होती जा रही है
रविवार की रात, घमहापुर निवासी 38 वर्षीय कारोबारी मनीष सिंह अपने कारखाने से घर लौट रहे थे।रास्ते में उनकी कार से एक महिला घायल हो गई. लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है.
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मनीष सिंह ने भागने के बजाय अपनी गाड़ी रोकी, घायल महिला की मदद के लिए आगे आए और स्वयं उसके इलाज का पूरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी भी ली. यह एक जिम्मेदार नागरिक का आचरण था.परन्तु क्या जातिवादी उन्माद की पनप रही जातीवादी राजनीति की पराकाष्ठा का परिणाम तो नहीं है
लेकिन कुछ ही मिनटों में वहां मौजूद भीड़ ‘न्याय’ नहीं, बल्कि ‘उन्माद’ में बदल गई.
लोगों ने पहले उनकी कार में तोड़फोड़ की और फिर उन्हें सड़क पर गिराकर लाठी-डंडों और लात-घूंसों से तब तक पीटा, जब तक उनकी सांसें थम नहीं गईं.
विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने मानवता दिखाई, उसी को भीड़ ने ‘सजा’ दे दी.
यह घटना कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है कि क्या हम कानून पर भरोसा खो चुके हैं
क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि मदद करने वाला भी सुरक्षित नहीं
यह केवल एक ‘रोड एक्सीडेंट’ नहीं था, बल्कि ‘भीड़तंत्र’ का वह चेहरा था, जिसमें तर्क मर जाता है और हिंसा ही भाषा बन जाती है.
आज सबसे बड़ा संकट यह है कि भीड़ में व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी खो देता है. वह सोचता नहीं, केवल प्रतिक्रिया करता है. और यही प्रतिक्रिया कई बार हत्या में बदल जाती है. यदि समाज को बचाना है, तो केवल पुलिस व्यवस्था से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से लड़ना होगा.
कानून का डर और मानवीय संवेदना दोनों को पुनर्जीवित करना होगा, अन्यथा ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं, सामान्य बन जाएंगी.
जब समाज संवेदनाशून्य होने लगता है, तब नृशंस हत्याएँ केवल शोक का विषय नहीं रहतीं बल्कि वे कुछ लोगों के भीतर छिपी क्रूरता का जश्न बन जाती हैं.
यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि मानवता और संवेदना की हत्या है.जातिवाद की पनप रही राजनीति में फैले कुंठित विचारों का परिणाम तो नहीं है क्या उन्मादी भीड़ ने मनीष सिंह के परिवार के साथ ये कैसा न्याय किया कि छोटे बच्चों के ऊपर से पिता का साया ही छिन लिया इसी को न्याय कहते है